Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

अपनी टिप्पणियां और सुझाव देना न भूलिएगा, एक रचनाकार के लिए ये बहुमूल्य हैं ...

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Oct 4, 2011

तीन क्षणिकाएं - नष्ट चाँद !


१)

शांत मन के झील में जो 
अक्सर उतर आता था
उज्जवल और स्पष्ट कभी,
आज इस अस्थिर चित्त 
में नहीं दिख पाता है 
अस्पष्ट चाँद !

२)

बड़ी कुटिल है
मुस्कान उसकी !
चुभती बड़ी है दिल में !
खुद झुककर मैंने 
हिला दिया पानी के 
शांत सतह को,
जाओ नहीं देखना है मुझे 
नष्ट चाँद !

३)

क्यूँ ढके रहते हो 
एक पक्ष अँधेरे में ?
कहाँ जाते हो 
अमाबस के दिन ?
इतना क्यूँ देते हो मुझे 
कष्ट चाँद ?

Sep 20, 2011

तीन क्षणिकाएं ... विभीषण !

बहुत दिन बाद फिर से कुछ क्षणिकाएं लिख रहा हूँ | माफ कीजियेगा पर मुझे कई बार ये समझ में नहीं आता है कि कई लोग रोज इतने सारे लेख, कविता, संस्मरण इत्यादि कैसे लिख लेते हैं | उनके प्रतिभा को प्रणाम | इधर तो ऐसा है कि जब तक अपने आप कोई बात दिमाग में न आये, लाख सर फोड लूँ , एक शब्द नहीं निकलता | और महीने में दो तिन या ज्यादा से ज्यादा ५-६ रचनाओं से ज्यादा कभी लिख भी नहीं पाता हूँ | चलिए इस बार आप सबके लिए ले आया हूँ तीन क्षणिकाएं जो देश के मौजूदा हालात पे टिपण्णी है |

१. विभीषण 

रावण के मृत्यु पश्चात
बड़े  धूमधाम से 
बनाया गया विभीषण को 
लंकाधिपति  |
और बनते ही राजा,
विभीषण बन गया 
रावण !

२. कसूरवार 

जब भी जंगल में कोई 
बाहर का भेडिया 
कर जाता है शिकार,
जंगल का राजा शेर
अपने भेडिया मंत्रियों के साथ 
करता है विमर्श, 
दहाड़ता है कि लेंगे बदला,
और फिर गहन चिंतन के बाद
तय होता है कि दोष दरअसल 
उन भेड़ों का है जो बहुसंख्यक हैं,
क्यूंकि उनका रंग सफ़ेद है |

३. हिम्मत

हमें करना होगा 
हिम्मत से सामना,
आतंकवाद और मुश्किलों का,
यह कहकर मंत्री जी
जा बैठे अपने बुलेटप्रूफ 
और वातानुकूलित
वाहन में |

Jun 8, 2011

इर्ष्या-फूल-दोस्ती : तीन क्षणिकाएं !


१)
झोपड़े में 
दीपक की रौशनी को देख,
फिर इर्ष्या से जल गया, 
महल का
झाड़ फानूस !

२)
कुछ फूल फैलाते हैं 
खुशबू हवा में,
और कुछ,
पास बुलाते हैं भ्रमर को
चमकीले रंगों की मदद से !

३)
धर्म ने फिर साथ दिया 
भ्रष्टाचार  का,
क्या खूब दोस्ती है दोनों में !
एक जनता को बांटता है,
दूसरा लूटता है !

May 15, 2011

एक साल - एक सपना - जन्मदिन स्पेशल !

देखते देखते एक और साल गुज़र गया ... व्यस्तताओं से घिरा हुआ, दुखों में डोलता, खुशियों में झूमता, कुछ उदास, कुछ मुस्कुराता, जीवन का एक और टुकड़ा ... और मैंने कहा था पिछले साल के पोस्ट में की शिवम जी के पोस्ट से मुझे यह  पता  चला था की आज के दिन अमर शहीद सुखदेव का भी जन्मदिन है ... तो आज आप सभी  दोस्तों से एक अनुरोध है ... छोटा सा है ... please please please मना मत करियेगा ....
आइये आज हम सब, जब भी हमें समय मिले, केवल एक मिनिट के लिए अपनी आँखें बंद करके भारत माता के उस महान सपूत को याद करलें ... यह हमारी तरफ से भारत माता के लिए स्वाधीनता संग्राम में जान देने वाले उन हजारों वीरों को सम्मान प्रदान करना होगा ...


कल रात एक सपना देखा ... आज आप सबके लिए उसी सपने को मैं अपनी शब्दों में ढालने की कोशिश किया है ...

कल रात देखा 
एक सपना अजीब सा !
दूर किसी गांव में,
हम और तुम,
दोनों मिलके बना रहे थे 
अपने लिए एक छोटा सा झोपड़ा ।
आसपास के जंगल से 
चुनके लाते
सुखी लकड़ी,
और पत्ते,
फिर उनसे बनाते हैं 
दीवार और छत  ...
फिर मिट्टी खोदके,
उसमें पानी मिलाकर,
गीली मिट्टी लगाते हैं 
दीवार पर और
झोपड़े के अंदर 
फर्श लेपते हैं ।
फिर मिट्टी के दीवारों को 
रंगते हैं अपने हाथों से,
सफ़ेद, पीली मिट्टी से 
अपने मन से बनाते हैं 
कुछ आड़ा तिरछा चित्र ।

कितना सुन्दर है वो छोटा सा,
मगर प्यारा सा,
अपना वो "घर" ।

मगर तभी मुझे दिखता है
दूर से आता भयानक तूफ़ान ।
तेज हवा का बवंडर ।
धुल का आसमान छूता अन्धकार ।
सबकुछ उड़ा ले जाने वाला 
प्रचण्ड  झंजावात ।

हम डर जाते हैं ।
ऐसा लगता है कि
इतने प्यार से संजोया हुआ 
ये घर बिखर जायेगा ।
ये जो सबकुछ है 
जाना पहचाना सा,
ये जो हम तिल तिल करके 
प्यार और मेहनत से बनाये हैं,
सब कुछ उड़ा के ले जायेगी 
ये समय की हवा ।

कितना डर, कितना डर !

लेकिन फिर हम दोनों
एक दुसरे को 
पकड़ते हैं अपनी बाहों में ।
कहते हैं एक दुसरे के कान में,
कि अगर बहा ले गई सबकुछ हवा,
फिर भी न हारेंगे हम,
फिर से बनायेंगे 
एक नया घर ।

और जानते हो 
फिर मैंने क्या देखा ?

मैंने देखा कि वो भयानक तूफ़ान 
थम गया अपने आप !
जैसे हारके हमारे प्यार के सामने
चला गया वापस ।

बस ऐसा ही कुछ सपना था 
शायद,
ठीक से याद नहीं है ...

क्या तुमने भी कोई देखा था 
सपना ?

May 8, 2011

मैं भी प्यार करता हूँ माँ


अपनी माँ के लिए मेरी बेटी द्वारा बनाई गई कलाकृति (उस पोस्ट पे जाने के लिए यहाँ क्लिक करें)

मैं भी प्यार करता हूँ माँ
नहीं दिखा पाता हूँ
मैं भी करता हूँ परवाह
नहीं बता पाता हूँ

कितने अच्छे थे वो दिन
जब तू लोरी सुनाती थी
अपनी गोदी में बिठाकर
प्यार से खाना खिलाती थी 

तेरी ममता के छांव में 
निश्चिन्त मैं पला बड़ा 
तुने बनाया इस लायक 
हूँ अपने पैरों पर खड़ा

पास तू नहीं है फिर भी 
सर पर तेरा आशीष है
तपते जीवन में तेरी 
स्नेह-ममता की बारिश है

Apr 25, 2011

बनके सितारा चमकता रहूँगा

 काफी दिनों बाद कोई रचना दे रहा हूँ ब्लॉग में .... एक हलकी फुलकी सी, प्यार भरी कविता प्रस्तुत है आप सबके लिए ... चित्र मेरे अपने एल्बम से है  ...
बनके नश्तर तुम
चुभ जाओ दिल में,
बनके ज़ख्म
मैं हँसता रहूँगा ।
नज़रों से भले तुम
गिरा दो मुझको,
दिल में तुम्हारा
मैं बसता रहूँगा ।

करते जाओ तुम
कितना भी सितम,
हर सितम तुम्हारा
मैं सहता रहूँगा ।
मानो न मानो,
मगर हर पल,
मैं हूँ तुम्हारा
यह कहता रहूँगा ।

सूनी सी रातों में
जब तुम अकेली,
बैठोगी यादों के 
एल्बम खोलकर ।
तुम्हारी यादों के 
आसमान में मैं,
बनके सितारा 
चमकता  रहूँगा ।

एकदिन अचानक
जब आयेगा पतझड़,
तुम्हारे चमन के 
एक कोने में तब भी ...
जैसे एक उम्मीद
की दहकती लौ,
खिलके सुमन मैं
महकता रहूँगा ।

दिल में तुम्हारा
मैं बसता रहूँगा ।


Mar 23, 2011

किसीने कहा “प्यार”

1)
जाने से पहले
हर किसीसे
कर लूँगा झगड़ा,
कि मेरे जाने के बाद
किसीको
मेरी कमी न खले ।

2)
झूठ के कठघड़े में
मैंने सच को हमेशा
कांपता पाया,
कि जैसा हो कोई
बलि का बकरा ।

3)
रिश्तों के चौराहे पर
खड़ा मैंने देखी 
एक शवयात्रा,
बड़ी धूम धाम से
बढ़ रही थी आगे ।
मैंने पूछा “कौन गुज़र गया”?
तो किसीने कहा “प्यार” ।



Mar 19, 2011

मन को रंग दो आज दया, करुणा के रंग से !

होली के मौके पर सभी ब्लॉगर साथियों को शुभकामनायें !
जापान में आई भयानक त्रासदी में भारत के सभी नागरिकों की तरफ से संवेदना व्यक्त करना चाहता हूँ और उन जांबाज़ लोगों को सलाम करना चाहता हूँ जो अपनी मौत की परवाह न करते हुए, परमाणु उर्जा संयंत्र में आई समस्याओं से जूझ रहे हैं, ये जानते हुए भी कि इससे उनकी मौत भी हो सकती है !
आप सबके लिए एक कविता प्रस्तुत है इस रंगों के उत्सव पर । उम्मीद है आपको पसंद आयेगी ।

ढेरों रंग रखे हैं मैंने
खूब खेलूंगा होली,
रंगों का उत्सव है आज
गाऊँ संग हमजोली ।

तेरे होठों की लाली है
रंग मेरे गालों पर,
आसमान का नीला रंग
से तू सपनों को भर ।

आँचल का हरा रंग
से मन हुआ नशीला,
तेरी मीठी मुस्कान से
मिला है रंग पीला ।

मन को रंग दो आज
दया, करुणा के रंग से,
मानवता में रंग लो और
सीखलो जीना ढंग से ।

Mar 8, 2011

औरत !

माँ बनके ममता का सागर लुटाती हो,
बहन हो हक और स्नेह जताती हो,
पत्नी बन जीवनभर साथ निभाती हो,
बन बेटी, खुशी से दिल भर जाती हो,


तुम में अनंत रूप, असंख्य रंग हैं ...
औरत, हर मोड़ पे साथ निभाती हो !


तुमसे है घर-द्वार, तुमसे संसार है,
सृष्टि भी बिना तुम्हारे लाचार है,
गुस्सा है तुम से और तुम से ही प्यार है,
हो साथ तुम तो क्या जीत क्या हार है,


बिना तुम्हारे न रहेगी ये दुनिया ...
औरत के कंधो पर सृष्टि का भार है !


International Women's Day पर मेरी बेटी भी पीछे नहीं रही और अपनी मम्मा के लिए एक सुन्दर सा कार्ड बनाई है जिसे आप यहाँ देख सकते हैं !

Jan 31, 2011

धूप – चाँद – रंग – खुशबू !

धूप
उस दिन जब तुम
खड़ी थी मेज के पास,
खिडकी से आकर
धूप का एक कतरा,
छूं लिया था
तुम्हारे चेहरे को ।
आज भी हर रोज़  
ठीक उसी समय,
वो आता है खिडकी से,
और ढूंढते रहता है
वो छुवन !

चाँद
देखो कितना शैतान है
ये चाँद !
जब तुम थी तो
फैलाकर चांदनी,
मुस्कुराता था ।
आज कितनी देर से
खड़ा हूँ खिडकी के सामने,
और वो छुपकर बैठा है
बादलों के पीछे !

रंग – खुशबू
वो जो ख्वाबों के पौधे
लगाये थे हमने
साथ मिलकर;
उनपर आज खिले हैं 
सुख के फूल ।
रंगीन, दिलकश !
पर न जाने क्यूँ,
नहीं है
उनमें खुशबू ।

Jan 5, 2011

बस पराई पीड़ देख




गगन में तू कृष्णकाय बादलों की भीड़ देख ।
अश्रुजल में भग्नप्राय स्वप्न का तू नीड़ देख ॥

असहनीय यातना हो, मन में तीव्र कष्ट हो ।
दिखा ना तू दर्द हाय, बस पराई पीड़ देख ॥

गरीबों में इन्कलाब कैसे आएगा बता ।
अभावों की वेदना से झुक गई है रीढ़ देख ॥

समस्या का सामना तू ‘सैल’ करना सीख ले ।
पहाड़ों पर गर्वोन्नत सर खड़ा है चीड़ देख ॥

चित्र साभार गूगल सर्च !

Jan 1, 2011

मनाते हैं आरंभ की खुशी


कभी छोटा,
कभी बड़ा,
कालखंडो में बंटा
मानव इतिहास,
मानव जीवन ।
जैसे पन्नों में बंटी
किताब ।
अब मौका है
कि पन्ना पलटो,
और लिखना शुरू करो
नए पन्ने पर ।
कुछ नए शब्द,
नई भाषा,
शायद पाठक भी नए हो !
एक अंत ही
एक शुरुआत है ।
मुहूर्त, पहर, दिन, महीना, साल
में बंटा जीवन,
को जीते हैं ।
मनाते हैं आरंभ की खुशी
भूल कर अंत का गम ।
सबसे कहते हैं
मुबारक हो आपको
२०११ ।

Dec 10, 2010

आशा की अग्निशिखा



क्यूंकि दुखी हूँ मैं,

और उदास है मन मेरा 

चलो मुस्कुराते हैं ...

और हँसते हँसते भूल जाते हैं दर्द को

चलो मुस्कुराते हैं ...

क्यूंकि थका हूँ मैं

और घायल है रूह मेरी  

चलो कुछ करते हैं

कुछ काम से मिटाते हैं थकन को

चलो कुछ करते हैं

क्यूंकि नाराज़ हूँ सबसे 

चाहता नहीं है कोई मुझे

चलो प्यार करते हैं

इतना प्यार कि भूल जाऊं नफरत 

चलो प्यार करते हैं

क्यूंकि मिलता है धोखा

और टूटते हैं सपने मेरे

चलो दीप जलाते हैं

आशा की अग्निशिखा आँखों में 

चलो दीप जलाते हैं 

चित्र साभार गूगल सर्च

Nov 25, 2010

शुरुआत नई जिंदगी की

कहीं होता है दर्द तो चल पड़ती है कलम ... मानो बनकर स्याही दर्द भर जाता है कलम में ... मानो बनकर शब्द बोल पड़ती है आंसू, मानो बनकर लकीरें बह निकलता है एहसास ...
दो क्षणिकाएं प्रस्तुत है हर उस नारी के नाम जिसने देखी है जिंदगी !

१. 
मन के किसी कोने में बैठी,
आज भी,
कोई छोटी सी बच्ची  है !
चाहो तो कह लो कल्पना, 
या कविता, 
पर बिलकुल सच्ची है ...

२. 
आपदा अपने पीछे, 
छोड़ जाती है खंडहर  ।
पर इंसान
हर आपदा के बाद,
नए सिरे से करता है निर्माण ।
बसता है नया शहर, 
होती है शुरुआत,
नई जिंदगी की ।

Nov 14, 2010

एकदिन हकिक़त में बदलेंगे हम सपनों को

बाल दिवस के मौके पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनायें ... खास कर उन सभी निष्पाप कलियों को जिनके रंग से रंगी है हमारी बगिया और जिनकी खुशबू से महका है ये चमन ...
साथ ही प्रस्तुत है इस मौके पर मेरी बेटी चिन्मयी द्वारा बनाई गई चाचा नेहरु की एक तस्वीर ... यह तस्वीर उसके ब्लॉग LITTLE FINGERS पर प्रकाशित की गई है ...


 
उमंगों के झोकों पर
उड़ती सपनों की पतंगें
पर है थामे हम उनकी
डोर अपने हाथों में
नन्हे मुन्ने हाथों में

बदलेंगे हम दुनिया
हम गढ़ेंगे, हम लिखेंगे
अपने देश का स्वर्णिम
भविष्य अपने हाथों से
नन्हे मुन्ने हाथों से  

एकदिन हकिक़त में
बदलेंगे हम सपनों को
देखेगी सारी दुनिया
कमाल अपने हाथों के
नन्हे मुन्ने हाथों के  

Oct 15, 2010

रेखाएं

१.

वो हाथ की रेखाएं
दिखाता फिरा उम्र भर,
जानने के लिए
भविष्य अपना ।
और उसका अतीत
उभरता चला,
उसके चेहरे की
झुर्रियों में ।

२.
डूबते को तिनके का
सहारा ही काफी है,
जैसे किस्मत के मारो को
भाग्य रेखा का ।
काश तिनके बचा पाते,
डूबने से ।



Oct 9, 2010

राही तू बस चलता चल

राही तू बस चलता चल ।

कलका देखना तू कल ॥

गांव, शहर और मफ्सल ।

पीछे छोड़, आगे बढ़ चल ॥

कोई सोये या जागे ।

सर पे धुन है बढ़ आगे ॥

राही पथ पे कितने छांव ।

फिरभी न रुकते हैं पांव ॥

पर्वत या नदीया नाले ।

पैरों में पढते छाले ॥

लेकर साथियों को बढ़ ।

सामने नज़रों को गढ़ ॥

धरती उठेगी थर्रा ।

रोशन हो ज़र्रा ज़र्रा ॥

बाज़ी पे लगा दे जान ।

छोड़ क़दमों के निशान ॥

राही ना मंज़िल कोई ।

आँखें थकी न सोई ॥

गर्मी, सर्दी या बरसात ।

शाम, सुबह या दिन रात ॥

पग में चुभते है कांटे ।

किस्मत ने है दुःख बांटे ॥

करके बाधाओं को पार ।

सहके नाकामी की मार ॥

राही चलना अपना काम ।

रुकना कहाँ, क्या मुकाम ॥

नभ हो, स्थल हो, या के जल ।

राही तू बस चलता चल ...
राही तू बस चलता चल ॥


Oct 4, 2010

कुछ पानी के छींटे


सोचकर गया था कि बस महीने भर का काम है, निपट जायेगा । पर देखते देखते दो महीने हो गए । इन दो महीनों में फुर्सत नहीं मिली कि ब्लॉग जगत में आ पाऊँ ।
आज फिर समय मिला है कि बैठूं, कुछ पोस्ट करूं और सबके पोस्ट को पढ़ पाऊँ । तो लीजिए आपके लिए प्रस्तुत है ये रचना । उम्मीद है आप सबको पसंद आयेगी ।

१)
सुबह से बारिश हो रही है
हवा, मिटटी और मौसम,
मन भी गीला गीला सा ।
इस भीगी शाम का
क्या करूं
एकबार बता दो,
आ जाओ ।

२)
रास्ते के बाज़ू में,
पानी के छींटे,
जैसे कि तुम आये
और चले गए,
जीवन में कुछ
यादों के धब्बे छोड़कर ।

३)
उसने पुछा
"रुक क्यूँ नहीं जाते?"
मैंने कहा
"बारिश आ रही है"
अब, उसे कैसे कहूँ
मौसम तो बस बहाना है ।

 

आप को ये भी पसंद आएगा .....

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