Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

अपनी टिप्पणियां और सुझाव देना न भूलिएगा, एक रचनाकार के लिए ये बहुमूल्य हैं ...

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Apr 8, 2010

यहाँ न कोई ठौर होगा


आज यहाँ मुकाम है, कल कहीं और होगा !
आने जाने का ज़माने में यूँ ही दौर होगा  !!
कौन रुका है हमेशा के लिए मेरे दोस्त !
न हुआ था यहाँ कभी न कोई ठौर होगा !!

Mar 1, 2010

बड़ी देर तक

काफिला गुज़र गया, उडती रही धूल बड़ी देर तक !
राह में उनके फिर भी पड़े रहे फूल बड़ी देर तक !!
हमभी तडपे थे बहुत उनकी गफलतो बेवफाई पर !
पछताए होंगे वो भी देख अपनी भूल बड़ी देर तक !!
(Copyright reserved by: Indranil Bhattacharjee)

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