Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

अपनी टिप्पणियां और सुझाव देना न भूलिएगा, एक रचनाकार के लिए ये बहुमूल्य हैं ...

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May 29, 2011

ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

ये चित्र मेरा अपना लिया हुआ है !

आज  फिर आप सबके लिए एक ग़ज़ल प्रस्तुत कर रहा हूँ जो मैंने "मुफायलुन्  मुफायलुन्" बहर में कहने की कोशिश की है ... बताइए ज़रूर कि आपको कैसी लगी मेरी ये कोशिश ...


ये जिंदगी, पता है क्या ?
न खत्म हो, सज़ा है क्या ?

है आँख क्यूँ भरी भरी ?
किसी ने कुछ कहा है क्या ?

दिखाते हो हरेक को ।
ज़ख़्म अभी हरा है क्या ?

नसीब फिर जला मेरा ।
कि राख में रखा है क्या ?

है रंग फिर उड़ा उड़ा ।
मेरी खबर सुना है क्या ?

सज़ा तो मैंने काट ली ।
बता दे अब खता है क्या ॥

रगड़ लो हाथ लाख तुम ।
 लिखा है जो मिटा है क्या ?

समझ गया पढ़े बिना ।
कि खत में वो लिखा है क्या ॥

जो टूटे वो जुड़े नहीं ।
ज़ख़्म कभी भरा है क्या ?

खुदा है वो पता उसे ।
कि दिल की अब रज़ा है क्या ॥

ज़रा सा गम मिलाया है ।
ग़ज़ल में अब मज़ा है क्या ?

समझ सका न “सैल” ये ।
अजीब सिलसिला है क्या ॥

May 11, 2011

उजले कपड़ो में ढका है तन देखो

भारत में तकनिकी विकास के साथ साथ नैतिक और सामाजिक अधःपतन एक विकराल रूप धारण कर चूका है । आदमी जितना शिक्षित होते जा रहा है उसमें उतना ही नैतिक गिरावट परिलक्षित हो रही है । पहले अनपढ़ लोगों में भी व्यवहार कुशलता होती थी, पर आज के ज़माने में उच्च शिक्षित लोगों में भी अहंकार और कुंठा बहुतायत में देखने को मिल रहा है । वहीँ बृहत्तर समाज में भ्रष्टाचार एक भयंकर समस्या के रूप में उभरा है । खासकर राजनैतिक क्षेत्र में अब ईमानदारी लगभग लुप्त हो चुकी है । जिस खादी के दम पर गांधीजी स्वाधीनता का संग्राम लढे थे, वही खादी आज भ्रष्टाचार का प्रतीक बन चूका है । सच्चे समाज सेवक भले ही अनशन करते हुए मर जाएँ पर इन भ्रष्ट राजनीतिज्ञों को कोई फर्क नहीं पड़ता है । जिस जनता के वोट से वो सत्ता में आये हुए हैं उसी जनता को लूटने में व्यस्त हैं । इन्ही विचारों से सजी यह ग़ज़ल पेश है आप सबके लिए ।

उजले कपड़ो में ढका है तन देखो ।
विष का प्याला भी भरा है मन देखो ॥

कितना शिक्षित हो गया है हर कोई ।
बस्ती बस्ती बन गया है वन देखो ॥

जिसको पाला था जिगर के टुकड़ों से ।
उसने है मुझपर उठाया फन देखो ॥

हाथों को जोड़े खड़े हैं नेतागण ।
खादी में लिपटा है काला धन देखो ॥

भ्रष्टाचारी ना मिटेंगे राष्ट्र से ।
अनशन करते मिट गया जीवन देखो ॥

Feb 18, 2011

क्या करें !

हर पल यही उलझन है कि क्या करें .... फिरते रहे जिंदगीभर यूँ ही उलझनों की अंधी गलियों में ... पर कुछ उलझन ऐसी भी होती हैं जो खूबसूरत होती हैं ... और कभी जी करता है कि फिर ये उलझन कभी न सुलझे ...

क्या करें उनसे शिकायत, क्या करें ।
जो है कातिल, वो अदालत, क्या करें ॥
हमने पूछा चाहिए क्या ये बता ।
मांग ली उसने मुहब्बत, क्या करें ॥
राह तकते हो गए आखिर फना  ।
आ गया रोज़े क़यामत, क्या करें ॥
है बड़ी कातिल अदा, उनकी कसम ।
मार डालेगी शरारत, क्या करें ॥
वो सदा में सर्द मेहरी, क्या कहूँ ।
उफ़ नज़र की ये हरारत, क्या करें ॥
ज़ख्म सारे ज़र्द दिल में हैं रखे  ।
जैसे हुज्जते इनायत, क्या करें ॥
‘सैल’ मैंने देखकर बेहिस् जहां ।
छोड़ दी है अब शराफत, क्या करें ॥

तस्वीर मेरी अपनी ली हुई है ...

Jan 5, 2011

बस पराई पीड़ देख




गगन में तू कृष्णकाय बादलों की भीड़ देख ।
अश्रुजल में भग्नप्राय स्वप्न का तू नीड़ देख ॥

असहनीय यातना हो, मन में तीव्र कष्ट हो ।
दिखा ना तू दर्द हाय, बस पराई पीड़ देख ॥

गरीबों में इन्कलाब कैसे आएगा बता ।
अभावों की वेदना से झुक गई है रीढ़ देख ॥

समस्या का सामना तू ‘सैल’ करना सीख ले ।
पहाड़ों पर गर्वोन्नत सर खड़ा है चीड़ देख ॥

चित्र साभार गूगल सर्च !

Dec 23, 2010

दर्द में दिल के ज़ख्म गाते रहे



फिर हाज़िर हूँ आप सबके सामने एक और छोटी सी ग़ज़ल लेकर .... बहर वही ''फायलातुन, फायलातुन, फायलुन' ... 

दर्द में दिल के ज़ख्म गाते रहे ।
इस तरह वो हर सितम ढाते रहे ॥

राह में तो मुश्किलें आती रहीं ।
साथ जो थे छोड़कर जाते रहे ॥

याद जो आये थे पीछे छोड़कर ।
उस को अब हर मोड़पर पाते रहे ॥

वो किया न फिर यकीं हम पर कभी ।
अपने सर की हम कसम खाते रहे ॥

‘सैल’ जितनी दूर उनसे हो चले ।
याद उतनी वो हमें आते रहे ॥

Dec 18, 2010

आईने के पीछे रहता कौन है


दिल में न जाने कितनी बातें आती जाती रहती है । कई बात ऐसी होती है जिनको कविता में ढालना संभव नहीं हो पाता है । कई बात ऐसी होती है जिनके बारे में सोचते सोचते वो एक कविता या ग़ज़ल का रूप ले लेती है । अक्सर ऐसा होता है कि लाख कोशिश करूँ, कुछ भी नहीं लिख पाता हूँ । और कभी कभी अपने आप पंक्तियाँ बह निकलती हैं । 
तो दोस्तों फिर हाज़िर हूँ आपके सामने एक ताज़ातरीन ग़ज़ल लेकर । 
इस ग़ज़ल को मैंने 'फायलातुन, फायलातुन, फायलुन' बहर में लिखने की कोशिश की है ।


आईने के पीछे रहता कौन है ।
रोज ऐसे मुझपे हँसता कौन है ॥
पीठ पर यूँ हाथ हमदर्दी के रख ।
दुःख पे मेरे मुंह चिढाता कौन है ॥
जब भी नैनो के झरोखे बंद हो ।
द्वार मन का खटखटाता कौन है ॥
वार दिल पर करती है तीरे नज़र ।
मुंह छुपाके मुस्कुराता कौन है ॥
आज महफ़िल में तमाशा देख लो ।
बिन पिए ही लड़खड़ाता कौन है ॥
चाहिए मुझको सवेरा बस अभी ।
रात अँधेरे में रोता कौन है ॥
करके बातें दीन मज़हब की यहाँ ।
आग बस्ती में लगाता कौन है ॥
‘सैल’ को बोलो कि ऐसा ना करे ।
दिल्लगी में दिल लगाता कौन है ॥


Dec 4, 2010

राम को राज दिलाकर देखो


कैकयी को समझाकर देखो ।
राम को राज दिलाकर देखो ॥
फासले बीच के मिट जायेंगे ।
हाथ से हाथ मिलाकर देखो ॥
छोड़के बात समझदारी की ।
जोश में होश गवांकर देखो ॥
खेल में और मज़ा आएगा ।
हार या जीत भुलाकर देखो ॥
प्रीत की आग धधक उठेगी ।
दर्प की राख उड़ाकर देखो ॥
“सैल” समाज सुधर जायेगा ।
जात औ पात हटाकर देखो ॥

Nov 29, 2010

लीजिए, आनंद लीजिए !

इससे पहले के पोस्ट में मैंने जो ग़ज़ल दी है वो जिस ग़ज़ल से प्रेरित है अब आप उसका लुत्फ़ उठाइए ... बहुत ही बेहतरीन और खुबसूरत ग़ज़ल है ...  जिसे लिखा है राजेश रेड्डी जी और उसे खुबसूरत ढंग से गाया है जगजीत सिंह जी .... सुनिए ये ग़ज़ल जगजीत सिंह जी के एल्बम "आईना" से ...


घर से निकले थे हौसला करके
लौट आए खुदा खुदा करके
दर्द ए दिल पाओगे वफा करके
हमने देखा है तजुरबा करके
जिंदगी तो कभी नही आई 
मौत आई है ज़रा ज़रा करके
लोग सुनते रहे दीवारो की बात
हम चले दिल को रहनुमा करके
किसने पाया सकून दुनीया में
जिंदगानी का सामना करके


Nov 28, 2010

क्या किया है तुने खुदा बनके


आज बैठकर एक सुन्दर ग़ज़ल सुन रहा था । सोचा क्यूँ न इसी बहर में कुछ लिखा जाये । सुनते सुनते जेहन में अपने आप निम्नोक्त पंक्तियाँ आ गयी । अब आप ही बताइए कि ग़ज़ल कैसी लगी ?

क्या किया है तुने खुदा बनके ।
तू बता सब का आसरा बनके ॥
जिंदगी ने छुड़ा लिया दामन ।
मौत आई है मेहरबां बनके ॥
ये न पूछो कि कैसे महफ़िल में ।
जलते रहता हूँ मैं शमा बनके ॥
दर्द मुझको पता न था क्या है ।
उसने समझाया बेवफा बनके ॥
क्यूँ खड़ा फिर वही नज़ारा है ।
सामने आज इम्तहां बनके ॥
इतने पागल हैं, आह भी दिल से ।
आज निकली है बस दुआ बनके ॥
क्या तूफां से गिला है जब छोड़ा ।
“सैल” कश्ती को नाखुदा बनके ॥


अरे ठहरिये ठहरिये , इतनी भी जल्दी क्या है ... टिप्पणी दे दीजियेगा ... पर अभी फिलिम खतम नहीं हुई है ... कहानी अभी बाकि है मेरे भाई ...
आपको ये बताना है कि वो कौन सी ग़ज़ल है जिसे सुनकर मेरे जेहन में ये पंक्तियाँ आई है ...
हिंट दे देता हूँ ... इस ग़ज़ल को जगजीत सिंह जी ने गाई है ...
आप बहर पे ध्यान दीजिए ... सवाल बहुत आसान है ... जवाब का इंतज़ार रहेगा ...


चित्र साभार मेरी प्रियतमा तृप्ती .

Nov 19, 2010

हमने देखी है ये समा अक्सर


हमने देखी है ये समा अक्सर ।
तन्हा महफ़िल में दिल रहा अक्सर ॥
अश्क जो हमने यूँ छुपाया था ।
उससे अपना ही दिल जला अक्सर ॥
फिर किसी बात पे न रोयेंगे ।
रोये हैं करके फैसला अक्सर ॥
पीठ पीछे जो चोट करता था ।
हंसके फिर वो गले मिला अक्सर ॥
साथ चलने की कसमें खाई थी ।
वो मिला है जुदा जुदा अक्सर ॥
अब तो मुझको भी मौत आ जाये ।
“सैल” मांगी है ये दुआ अक्सर ॥

Jul 24, 2010

रुक रुक कर यूँ चलना क्या



बहुत दिनों बाद फिर से एक ग़ज़ल लिखने की कोशिश की है मैंने, उम्मीद है आप सबको पसंद आयेगी ....

रुक रुक कर यूँ चलना क्या ।
अंधेरों में पलना क्या ॥

कर दो जो भी करना है ।
फिर हाथों को मलना क्या ॥

परवाने सा जल जाओ ।
टिम टिम कर यूँ जलना क्या ॥

फैला दो अब लालिमा ।
बादल पीछे ढलना क्या ॥

फल से लदकर झुक जाओ ।
इतने ऊपर फलना क्या ॥

अब तो दिल को समझाओ ।
खुद ही खुदको छलना क्या ॥

जाने क्या कहता है ‘सैल’ ।
उसकी बातें खलना क्या ॥

चित्र साभार गूगल सर्च

May 6, 2010

इसलिए उनका नाम बहुत है


सर पे उनके इलज़ाम बहुत है ।
इसलिए उनका नाम बहुत है  ॥

जाते हैं वो विदेश मुफ्त में ।
देश में उनका दाम बहुत है ॥

अगले चुनाव से पहले बिजली ।
गाँव गाँव में काम बहुत है ॥

करनी है ना शायरी अबके ।
शायरी में ताम झाम बहुत है ॥

अब जागो बहुत कठिन डगर है ।
कर लिया यूँ आराम बहुत है ॥

पूछा है नाम जो उसने हंसके ।
इतना "सैल" इनाम बहुत है ॥

आप को ये भी पसंद आएगा .....

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