Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

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May 2, 2010

कागज की कश्ती


चलिए हंसी मजाक हो गया, अब फिर से संजीदा कुछ हो जाये - 

कर लो चाहे कुछ भी पर ये यार नहीं कर पाओगे
कागज की कश्ती से सागर पार नहीं कर पाओगे

पी कर आंसुओं को मैंने, रखकर छाती पर पत्थर
जिस तरह किया है इंतज़ार नहीं कर पाओगे

लेकर नाम उनका तुमने पुकारा है सरे राह
ऐसी गुस्ताखी मगर हर बार नहीं कर पाओगे

वादा खिलाफी इस तरह मत करो तुम मान लो
हम रूठे तो खुद पर भी ऐतबार नहीं कर पाओगे

मुंह पर 'ना' हो आज भले ही लेकिन मेरा दावा है  
आयेगा इक दिन सैल इनकार नहीं कर पाओगे

चित्र साभार गूगल सर्च 

29 comments:

  1. बहुत खूबसूरत दावा.....इनकार नहीं कर पाओगे....खूबसूरत ग़ज़ल...बधाई

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  2. wah har sher laajawaab. bahut acchha laga aapko padh kar.badhayi.

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  3. Bahut bahut khoobsoorat gazal..kamal hai!

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  4. खूबसूरत यकीन को खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया है आपने।
    बधाई।

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  5. कर लो चाहे कुछ भी पर ये यार नहीं कर पाओगे ।
    कागज की कश्ती से सागर पार नहीं कर पाओगे ॥
    सही है, क़ागज़ की कश्ती से सागर तो पर नहीं ही कर सकते।
    ख़ूबसूरत ग़ज़ल।

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  6. छाती पर पत्थर ....?
    तौबा ....तस्वीर ही लगा देते उस पत्थर की .....
    इन्तजार है ये इनकार इज़हार में बदल जाये .....!!
    बहुत खूब ....!

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  7. हीर जी , वैसे तो कहावत में दिल पर या फिर कलेजे पर पत्थर रखा जाता है ... पर यहाँ कविता की खातिर मैंने थोडा सा बदल दिया है ...

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  8. bahut khub bhai saheb...
    maza aa gaya....

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  9. आँसुओं को पीकर मैंने, छाती पर पत्थर रखकर
    जैसे किया है वैसे तुम, इंतजार नहीं कर पाओगे.

    सैल भाई,
    मुखड़ा बहुत कमाल का. अंतरों पर और मेहनत करो. आपकी
    यह रचना मुझे बहुत प्यारी लग रही है.

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  10. bhav aur flow dono ke taur pe matla achha laga..baki sher aap se kuch waqt aur mangte hain apni behtari ke liye aisa mujhe laga.. :)

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  11. सागर के उस पार ही गर ज़िन्दगी खडी हो
    तो कागज़ की कश्ती का क्या है
    पानी पे भी चल जाओगे

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  12. प्रेम जी, आपकी यह पंक्ति -
    "जैसे किया है वैसे तुम, इंतज़ार नहीं कर पाओगे"
    बहर पर खरा नहीं उतर रहा है ...
    पर फिर भी सुझाव के लिए धन्यवाद, उम्मीद है आगे भी इसी तरह सुझाव देते रहेंगे ...

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  13. स्वप्निल जी, सुझाव के लिए शुक्रिया ...
    पर वो आप एक कहावत जानते हैं ना, अपना चेहरा हर किसी को सुन्दर दीखता है ... गलती अगर है तो वह कोई दूसरा ही ढूँढकर निकाल सकता है ... आप ने बाकि शेर की बात की है तो ज़रा उन गलतियों पर भी ऊँगली रख देते तो और बेहतर होता ...:)

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  14. रश्मि जी, इस शेर में 'कागज की कश्ती' से मेरा इशारा किताबी ज्ञान से है, और सागर यहाँ जीवन सागर है ... कहने का मतलब है कि सिर्फ किताबी ज्ञान के सहारे कोई भी जीवन के उतार चढाव को पार नहीं कर सकता है ... उम्मीद है अब मैं अपनी बात रख पाया हूँ ...

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  15. मक्ता और मत्ला खास पसंद आया

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  16. दारुन दादा............एकेबरे फाटा फाटी !!

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  17. बहुत आनन्द आ गया आपकी रचना पढ़कर.

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  18. BAHUT KHUB

    BADHAI AAP KO IS KE LIYE

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  19. कागज़ की कश्ती से पार नहीं कर पाओगे ...
    अर्थ स्पष्ट करने के बाद कविता /ग़ज़ल का अर्थ ही बदल गया ...
    आएगा एक दिन शैल तो इनकार नहीं कर पाओगे ...
    हौसला और आत्मविश्वास अच्छा लगा ...बना रहे ...!!

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  20. ग़ज़ल बहुत अच्छी लगी विशेषतः
    कर लो चाहे कुछ भी पर ये यार नहीं कर पाओगे ।
    कागज की कश्ती से सागर पार नहीं कर पाओगे॥
    बधाई

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  21. बहुत बढ़िया सम्प्रेषण के लिए शुभकामनायें

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  22. वाह...बहुत खूब

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  23. वाह ... सच है काग़ज़ की कश्ती से सागर पार नही होता ... साथ में हॉंसला और जज़्बा भी होना चाहिए ....

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  24. aapke blog par pahlee var hee aana hua .accha laga gazal bhee bahut pasand aaee...........

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