धूप
उस दिन जब तुम
खड़ी थी मेज के पास,
खिडकी से आकर
धूप का एक कतरा,
छूं लिया था
तुम्हारे चेहरे को ।
आज भी हर रोज़
ठीक उसी समय,
वो आता है खिडकी से,
और ढूंढते रहता है
वो छुवन !
चाँद
देखो कितना शैतान है
ये चाँद !
जब तुम थी तो
फैलाकर चांदनी,
मुस्कुराता था ।
आज कितनी देर से
खड़ा हूँ खिडकी के सामने,
और वो छुपकर बैठा है
बादलों के पीछे !
रंग – खुशबू
वो जो ख्वाबों के पौधे
लगाये थे हमने
साथ मिलकर;
उनपर आज खिले हैं
सुख के फूल ।
रंगीन, दिलकश !
पर न जाने क्यूँ,
नहीं है
उनमें खुशबू ।
