Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

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Jul 19, 2010

बस हो क्षुधा निवारण



यह रचना हर जीवित प्राणी के उस मजबूरी पर लिखी गई है जिसका नाम है "भूख" ....
कल हमारे साथ कुछ ऐसी बात घटी कि हम कुछ लिखने पे मजबूर हो गए । उस घटना को मैं यहाँ नहीं दे रहा हूँ, 
क्यूंकि उसका वर्णन आपको यहाँ मिल जायेगा
यही सत्य है, अमोघ,
शक्ति है तुम्हारी
सारा जगत, हर क्षण,
वश में है तुम्हारे
भयभीत है तुमसे,
हर प्राणी, जल-स्थल
नतमस्तक हैं सब,
देख तुम्हारे बाहुबल
हर सकते हो सभी के
बुद्धि, हिताहित ज्ञान
पाप-पुण्य, धर्म, कहीं  
तुम्हारा न समाधान,
तुच्छ है तुम्हारे आगे
सुख, दुःख हो या भय
जीता है न तुमसे कोई
भयानक हो, तुम अजय
निष्ठुर, निर्मम हो तुम,
जीवन की शर्त हो
सामाजिक मूल्यों के
मुंह पर एक गर्त हो
संभव ना है किसीसे
भी अनंत अनशन
खाद्य कुखाद्य हो
बस हो क्षुधा निवारण

चित्र साभार गूगल सर्च से लिया गया है

21 comments:

  1. Oh!Kitna bhayawah saty hai yah!

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  2. भूख का यह रूप देखा है जीवन में ! इस लिए कोशिश यही रहती है कि खाना बर्बाद ना होने पाए !

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  3. भूख ..... इसके आगे सब नतमस्तक हैं ..... सार्थक रचना है ...

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  4. bahut maarmik aur sunder rachna...



    --
    www.lekhnee.blogspot.com


    Regards...


    Mahfooz..

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  5. खाद्य कुखाद्य हो
    बस हो क्षुधा निवारण ।
    त्रासद रचना .. शब्द शब्द पिरोया हुआ

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  6. sach much ..admi per ke liye kya kya nahi karta hai .. duniyaan chal hi rahi hai tarah tarah ki bhookh ke bal par...

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  7. सही दिशा की ओर इंगित किया है आपने,अगर सभी इस ओर ध्यान दे तो यह स्थिति ही उत्पन्न नहीं होगी।

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  8. बहुत मार्मिक सटीक कविता

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  9. एक उम्दा पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं

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  10. do took kahun to...satya vachan
    jyada kahna bhookh ki saarthakta ko kam karna hoga.

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  11. मौत के बाद भी सबसे पहले यही कहते हैं "कुछ मुंह में डाल लो....." भूख !

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  12. इंद्रनील जी ,

    बहुत मार्मिक प्रस्तुति।

    निष्ठुर, निर्मम हो तुम,
    जीवन की शर्त हो ।

    इश्वर ने पेट की भूख देकर मनुष्य को शायद उद्यमी होने की शिक्षा दी है..
    .

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  13. Bhook! kya kya na najare dikhati hai jindagi mein...
    Dil kee gahrayee se likhi Marsparshi rachna

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  14. bahut hi zabardast aur marmik satya .
    तुम्हारा न समाधान,
    तुच्छ है तुम्हारे आगे
    सुख, दुःख हो या भय ।
    जीता है न तुमसे कोई
    भयानक हो, तुम अजय
    निष्ठुर, निर्मम हो तुम,
    जीवन की शर्त हो ।
    सामाजिक मूल्यों के
    मुंह पर एक गर्त हो ।
    संभव ना है किसीसे
    भी अनंत अनशन ।
    खाद्य कुखाद्य हो
    बस हो क्षुधा निवारण ।

    ati sundar .mujhe bangaal me huye akaal ki ghatna smaran ho aai

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  15. बेहद भावपूर्ण रचना... लाजबाव

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  16. क्या कहें....

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  17. एक संवेदनशील हृदय है आपके पास, तभी ऐसी मार्मिक कविता रच सकते हैं आप।
    भूख सबसे बड़ा सच है, सच में।
    आपके माध्यम से तृप्ति जी के ब्लॉग तक भी पहुंचे, पूरी घटना भी जानी और आपका नाम हिन्दी में कैसे उच्चारित किया जाये, मैं कन्फ़्यूज़ था इन्द्रनील, इन्द्रानिल या इन्द्रानील।

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  18. भूख से अधिक दुनिया मे क्या हो सकता है इस पेट के लिये आदमी क्या कुछ नही करता है। लेकिन तब ये त्रासदी बन जाती है जब एक इन्सान की भूख दूसरे इन्सान को खाने लगे। बहुत मार्मिक रचना है। आभार।

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