Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

अपनी टिप्पणियां और सुझाव देना न भूलिएगा, एक रचनाकार के लिए ये बहुमूल्य हैं ...

Jul 7, 2010

दर्द के फूल

30 comments:

  1. Rachana bahut sundar hai. Kewal ek iltija hai..."Maajee" ko "maazee" karen tatha,"khusboo"ko "khushboo"karen...wartani me sudhar laake yah rachana aur adhik sundar hogi.

    ReplyDelete
  2. क्षमा जी, बहुत बहुत शुक्रिया इन गलतियों पर ध्यान आकर्षित करने के लिए .... टाईप करने में गलती हो गई थी...अब सुधार दिया है ... शायद अब ठीक है ...

    ReplyDelete
  3. लगभग हम सभी के पास ऐसी एक ना एक किताब तो जरूर होगी ही !
    बहुत बढ़िया रचना !

    ReplyDelete
  4. इस बेहतरीन और भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई...
    नीरज

    ReplyDelete
  5. यादों की तह मे दबे दर्द के फूल कब मुरझाते हैं जब ज़रा सा पलट कर देखो गुबार सा छा जाता है और हर तरफ़ सिर्फ़ यादों का मंज़र ही नज़र आता है………………आपने बहुत ही सुन्दर रचना लिखी है…………………दिल मे उतर गयी।

    ReplyDelete
  6. नीरज जी, शिवम जी और वंदना जी, आप सबको बहुत धन्यवाद जो इस रचना को आप सबने सराहा ....

    ReplyDelete
  7. her kisi ki kitaab me yah phool mil hi jata hai

    ReplyDelete
  8. बहुत खूब ... मांझी की कुछ यादें हिस्सा बन जाती हैं जीवन का .... उम्दा रचना है ...

    ReplyDelete
  9. jehan ke hisaar me qaid ye fool nikalte kahan hain
    kuchh gulaab baagon ke ishq me fikrana hue jaate hain.

    bahut khubsurat lagi in foolon ki khushboo

    ReplyDelete
  10. रश्मि जी, नासवा जी और अविनाश जी, आप सबको शुक्रिया हौसला अफजाही के लिए ...

    @ अविनाश
    दरअसल यहाँ तो बात ही कुछ और हैं ... यहाँ गुलाब बाग के इश्क में नहीं, बल्कि बाग ही उस गुलाब के इश्क से कायल है ...

    ReplyDelete
  11. which one is better, you post or your comment @ avinash ji? very difficult to decide.

    ReplyDelete
  12. hehehe, ye bhi sahi..

    nahi, ye hi sahi :)

    ReplyDelete
  13. रचना भी सुन्दर है और उसकी प्रस्तुति भी.....बहुत पसंद आई...

    ReplyDelete
  14. इन्‍द्रनील जी यादों की किताब को इस तरह याद करना बहुत भाया। प्रस्‍तुतिकरण बहुत भाया। मेरे हिसाब से इसमें दो संशोधन आवश्‍यक हैं। कृपया देखें-यादों के तहों की जगह यादों की तहों होना चाहिए। इसी तरह कुछ अश्‍कों के बूंद मैंने गिराए उन पर के स्‍थान पर कुछ अश्‍कों की बूंदें मैंने गिराईं उन पर होना चाहिए। विचार करें।

    ReplyDelete
  15. राजेश जी, बहुत धन्यवाद, आवश्यक संशोधन कर दिए गए हैं !

    ReplyDelete
  16. कमाल का लिख डाला है आपने.
    आपको बधाई.

    ReplyDelete
  17. सूखे फूलों में लिपटा दर्द जब क़ितबों का हिस्सा हो जाए तो वह सदा बहार हो जाता है।

    ReplyDelete
  18. Bahut kuchh yaad aaya.....
    Kitni hee koshish kariye yaado ko mitane kee, wo nahin jaati!

    ReplyDelete
  19. बहुत खूब .....!!

    प्रस्तुति ने मन मोह लिया ....किताबों में रखे ये फूल अक्सर यादों के निशाँ छोड़ जाते हैं .....!!

    कुछ स्त्रीलिंग पुल्लिंग की गलतियां हैं सुधार लें ....!!

    ReplyDelete
  20. हरकीरत जी, कृपया वो स्त्रीलिंग-पुल्लिंग की गलतियां कौन सी हैं ये भी बता दें ...

    ReplyDelete
  21. After reading this poem, i opened my diary and lovingly touched the petals kept there..

    beautiful creation !

    ReplyDelete
  22. bahut achha likha...bahut hi badhiya

    ReplyDelete
  23. yadon ki kitab paltana bhi himmat ka kam hai.

    ReplyDelete
  24. बहुत खूब.... यादें यूँ ही दिल के जीवित होने का एहसास कराती रहतीं हैं.

    ReplyDelete
  25. जज़्बातों को बखूबी लफ्जों मे उकेरा है आपने
    बहुत सुन्दर रचना.......

    ReplyDelete
  26. इस बेहतरीन और भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत बधाई।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणियां एवं सुझाव बहुमूल्य हैं ...

आप को ये भी पसंद आएगा .....

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...