Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

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Aug 1, 2014

रोटी कपड़ा और मकान


1
अपने हिस्से की रोटी
बच्चे को खिलाकर,
तकती रही माँ
अधजली चाँद की तरफ;
मिट गई भूख ।

2
कितनी खुश थी वो,
पाकर नए कपड़े ।
कितने खुश थे हम,
उसे देकर अपने
कपड़े पुराने ।

3
जब तक बनती रही
ऊँची इमारत,
उसके छाँव तले
सलामत रहे
मजदूरो के झोपडे ।

35 comments:

  1. मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ बहुत दिनो के बाद आपको लिखते देखकर खुशी हुई।

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  2. सुन्दर एहसास

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  3. यही तो है लपेट कर चोट करना !

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  4. बहुत खूब। third one is really very poignant...

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  5. कल 03/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  6. वाह.. बहुत ही बढ़िया

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  7. वाह सुंदर, मर्मस्पर्शी

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  8. बहुत सुन्दर और मर्मस्पर्शी....

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  9. आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
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  10. बहुत बढ़िया मर्मस्पर्शी रचना..

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  11. बहुत संवेदनशील ... मर्म को छूते हुए ...

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  12. इस मार्मिक कल्पना को नमन्!

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  13. नमश्कार इंद्रनील जी! मैं पिछले आधे घंटे से आपकी विभिन्न कविताएँ पढ़ रही हूँ और काफ़ी प्रभावित हुई हूँ| आपकी कविताओं में कुछ तो है जो दिल को छू जाता हैं| आप बस ऐसे ही लिखते रहे|
    धन्यवाद!

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  14. बहुत ही सुंदर अभिवयक्ति। लाजवाब।

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  15. बहुत ही सुंदर अभिवयक्ति। लाजवाब।

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  16. wow very nice..happy new year2017
    www.shayariimages2017.com

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