Indranil Bhattacharjee "सैल"

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Apr 9, 2011

क्रोध - एक विश्लेषण

क्रोध एक ऐसी भावना है जो किसीके लिए मानसिक, शारीरिक या सामाजिक रूप से आहत होना, अन्याय का शिकार होना, या फिर किसी अभाव के कारण होने वाली बदले की प्रवृति का मनोवैज्ञानिक व्याख्या है ।
 

यदि आप पर सचमुच कोई अन्याय हुआ है तो क्रोध लाज़मी है, पर ऐसा नहीं है और आपको केवल ऐसा लग रहा है क्यूंकि आप इस वक्त उत्तेजित मानसिक अवस्था में हो, तो फिर क्रोध गलत है और आपके तथा आपसे जुड़े लोगों को हानि पहुंचा सकता है ।
 

R. Novaco नामक वैज्ञानिक ने कहा है कि क्रोध के तीन तौर तरीके है -  संज्ञानात्मक (मूल्यांकन), भावात्मक-दैहिक (तनाव और आंदोलन) और व्यवहार (वापसी और विरोध) ।
 

गुस्से में व्यक्ति को आसानी से गलती हो सकती है क्योंकि क्रोध में व्यक्ति स्वयं पे निगरानी रखने की क्षमता और निष्पक्ष निरीक्षण की क्षमता खो देता है । गुस्से में अक्सर हम सही को गलत और गलत को सही समझ बैठते हैं । इसलिए कहा जाता है कि कोई भी निर्णय गुस्से में न लिया जाय । क्यूंकि गुस्से में लिया हुआ कोई भी निर्णय कभी भी सही नहीं होता है ।
 

तो क्या क्रोध को दबा के रखना चाहिए ? मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा बिलकुल नहीं करना चाहिए । 

दरअसल क्रोध सुधारात्मक कार्रवाई के लिए मनोवैज्ञानिक संसाधन जुटा सकता है । लेकिन ये भी ध्यान रखें कि अनियंत्रित क्रोध, व्यक्तिगत या सामाजिक स्तर पे नुक्सान ही करता है । 

संतुलित व्यक्तित्व वो है जिसे यह पता है कि किस वक्त, किस तरह, किस पर, कितना और किस वजह से गुस्सा करना चाहिए ।
 

मनोवैज्ञानिकों के हिसाब से क्रोध तीन प्रकार के होते हैं:
  • 18 वीं सदी के अंग्रेजी बिशप जोसेफ बटलर, द्वारा "अचानक क्रोध" नाम से पुकारा गया यह क्रोध आत्मरक्षा के आवेग से जुड़ा हुआ है । यह मानव और पशु दोनों में दीखता है और तब होता है जब वो सताया जाता है या फँस जाता है ।
  • क्रोध के दूसरे प्रकार का नाम है "समझकर और जानबूझकर" क्रोध । यह तब होता है जब हमें लगता है कि कोई जानबूझकर और सोच समझकर हमें नुकसान पहुंचा रहा है ।
क्रोध के उपरोक्त दो रूप सामयिक है ।
  • क्रोध के तीसरे प्रकार "फितरती" क्रोध और किसी स्वभावतः क्रोधी व्यक्ति के व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ होता है । इनके चरित्रगत लक्षण होते हैं चिड़चिड़ापन, हमेशा की नाराजगी और गुस्से । यह अक्सर देखा गया है कि दम्भी व्यक्ति को सहज ही क्रोध आ जाता है । जो खुद को दूसरों से बेहतर समझता है वो आसानी से क्रोधित भी हो जाता है ।

भारतीय दर्शन में क्रोध को दुःख और दंभ के साथ जोड़ के देखा गया है । इस में ऐसा समझा जाता है कि किसी कारण जब कोई दुखी हो जाता है तो उसे क्रोध आ सकता है । इस दुःख के कारण अलग अलग हो सकता है । कभी हमें यह लगता है कि हम पर अन्याय हुआ है । कभी हमें वो नहीं मिलता है जो हम चाहते हैं, और इस कारण भी दुःख हो सकता है । अक्सर यह होता है कि हम खुदके बारे में अपने ही मन में बहुत उच्च धारणा बना लेते हैं ।  इसे दंभ कहते हैं । जब हम दूसरों के व्यवहार से हमारे इस धारणा को ठेस पहुँचते देखते हैं तो हमें दुःख होता है ।

यह अक्सर देखा गया है कि जब कोई क्रोध दिखाता है तो लोग उसकी बात आसानी से मान लेते हैं । धीरे धीरे यह बात उसकी आदत बन जाती है और वह हर बात पे गुस्सा दिखाना शुरू कर देता है । इस बात से अक्सर सामाजिक स्तर पे असमानता बढती जाती है । क्रोधी व्यक्ति व्यक्तिगत संबंधों में भी हमेशा क्रोध को इस्तमाल करके जीतने की कोशिश करते रहता है । इसका नतीजा यह होता है कि संबंधों में खटास आ जाती है ।

33 comments:

  1. जिसने क्रोध पर विजय पा ली उसने जग जीत लिया।

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  2. सैल जी, ऐसे पोस्टों की जरुरत होती हैं. अच्छी प्रस्तुति के लिए आप बधाई के हकदार हैं.

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  3. सुन्दर विश्लेषण !

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  4. क्रोधी व्यक्ति व्यक्तिगत संबंधों में भी हमेशा क्रोध को इस्तमाल करके जीतने की कोशिश करते रहता है --ये सही लगी बात अजमाई हुई ,सही और सुंदर तरीके से किया गया विश्लेषण

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  5. मानव स्वभाव पर रोशनी डालती एक सार्थक प्रविष्टि। क्रोध को अल्पकालिक पागलपन भी कहा जाता है। अपने क्रोध पर काबू पाना और क्रोधी व्यक्ति के साथ डील करना दोनोंके लिये ही पर्याप्त धैर्य चाहिये। एक अजीब बात मैंने और महसूस की है, बहुधा लोग उम्र के बढ़ने के साथ क्रोध की मात्रा को जोड़ते हैं, मैंने अलग अलग लोगों के क्रोध पर उम्र का अलग अलग प्रभाव देखा है। कुछ उम्र बढ़ने के साथ और ज्यादा चिड़चिड़े हो जाते हैं और कुछ अपना क्रोध काबू में करना सीख जाते हैं।

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  6. @ संजय जी,
    जब हर किसीका व्यक्तित्व अलग अलग होता है तो स्वाभाविक है कि उनका व्यवहार और क्रोध का उनपर प्रभाव भी अलग होगा ...

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  7. गुस्से में व्यक्ति को आसानी से गलती हो सकती है क्योंकि क्रोध में व्यक्ति स्वयं पे निगरानी रखने की क्षमता और निष्पक्ष निरीक्षण की क्षमता खो देता है । गुस्से में अक्सर हम सही को गलत और गलत को सही समझ बैठते हैं । इसलिए कहा जाता है कि कोई भी निर्णय गुस्से में न लिया जाय । क्यूंकि गुस्से में लिया हुआ कोई भी निर्णय कभी भी सही नहीं होता है
    solah aane sach kaha .saarthak lekh .

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  8. कहते हैं क्रोध में आदमी को कुछ दिखाई नहीं देता !
    क्रोध करने से सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है !
    जानकारीपूर्ण पोस्ट के लिए धन्यवाद !

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  9. मानवीय कमजोरी क्रोध पर सटीक विश्लेषण . क्रोध मनुष्य को विवेक हीन बना देता है .

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  10. क्रोध पर अच्छा विश्लेषण ...अच्छी पोस्ट

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  11. क्रोध की आंखें नहीं होतीं, केवल मुंह होता है।
    अच्छा विश्लेषण।

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  12. क्रोध पर विस्तृत चर्चा पढ़ी. क्रोध आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है.अगर कोई कहे कि उसे क्रोध नहीं आता तो या तो वह झूठ बोल रहा है या डिप्रेशन की गिरफ्त में है. क्रोध में तुरंत प्रतिक्रिया अक्सर नुकसान दायक होती है. परन्तु cool होकर और सही अवसर तलाश कर जवाब दें ज़रूर.इससे जवाब भी सटीक होगा और मन भी अशांत नहीं रहेगा.

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  13. सुन्दर प्रविष्टि। सम्भव हो तो क्रोध का पोषण-जैव-रासायनिक सम्बन्ध भी बताइये किसी अगली कडी में।

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  14. सैल भाई,
    क्रोध तो क्रोध है, चाहे फिर वो किसी भी प्रकार का हो, अंत में निराशा ही हाथ लगती है!
    उम्दा लेख प्रकाशित करने के लिए आभार!

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  15. Anger is an acid that does more harm to the vessel in which it is stored rather than to the person on whom it is poured.

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  16. क्रोध का बहुत गहन विश्लेषण..क्रोध वह अग्नी है जिसकी ताप में मनुष्य का विवेक पूरी तरह जल जाता है और वह स्वयं अपना नुक्सान करता है. बहुत सार्थक पोस्ट.

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  17. sarthak lekh. krodh ka itna gahan vishleshan....yad rakhna chaahiye.

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  18. मानवीय कमजोरी क्रोध पर सटीक विश्लेषण|धन्यवाद|

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  19. सार्थक विश्‍लेषण,जानकारीपूर्ण पोस्ट के लिए धन्यवाद !

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  20. सर सार्थक और सुंदर पोस्ट बधाई और शुभकामनाएं |

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  21. मानव के मनोविकार क्रोध का सुन्दरता से विश्लेषण किया है आपने.

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  22. bahut achhe se krodh par likha hai aapne....

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  23. मैं भी कई बार यह मह्सून किया है कि खुद को क्रोध आने पर मैंने रोक लिया और फिर कुछ देर बाद उसी बारे में सोचा तो लगा कि अच्छा हुआ कि जो रोक लिया नहीं तो व्यर्थ ही किसी को मेरा क्रोध झेलना पड़ता जिसका उपाय आम वार्तालाप से भी हो सकता था.. क्रोध पर नियंत्रण रखना वाकई में बहुत ज़रूरी है.. अच्छी जानकारी...

    तीन साल ब्लॉगिंग के पर आपके विचार का इंतज़ार है..
    आभार

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  24. सुन्दर पोस्ट लिखी
    बधाई

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  25. संतुलित व्यक्तित्व वो है जिसे यह पता है कि किस वक्त, किस तरह, किस पर, कितना और किस वजह से गुस्सा करना चाहिए ।

    जब इस प्रकार का क्रोध होगा तो वह क्रोध होगा ही नहीं सिर्फ क्रोध का अभिनय होगा ।
    वास्तविक क्रोध की झलक आप मेरे ब्लाग नजरिया पर मेरी आने वाले कल की पोस्ट में देखने पधारिएगा ।

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  26. @सुशील बाकलीवाल
    संतुलित तरीके से क्रोध को अभिव्यक्त करने का मतलब यह नहीं कि वो अभिनय ही हो ... यहाँ बात हो रही है ज़ब्त की ... जैसे कि मैंने कहा है असंतुलित क्रोध एक दुधारी तलवार है जो दोनों को काटता है ...

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  27. @Pratik Maheshwari
    आपने सही कहा ... पर क्रोध पे नियंत्रण रखना आसान नहीं है ... इसके लिए भी अभ्यास चाहिए ...

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  28. बुद्ध के अनुसार हमें अपनी साँस पर ध्यान करना चाहिए . मानव-वृतियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है ..क्रोध का सुन्दरता से विश्लेषण किया है

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  29. बहुत खूब !
    शुभकामनायें आपको !

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  30. क्रोध के भाव का विविधतापूर्ण विवेचन. बहुत अच्छी पोस्ट.

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