Indranil Bhattacharjee "सैल"

दुनियादारी से ज्यादा राबता कभी न था !
जज्बात के सहारे ये ज़िन्दगी कर ली तमाम !!

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Oct 15, 2010

रेखाएं

१.

वो हाथ की रेखाएं
दिखाता फिरा उम्र भर,
जानने के लिए
भविष्य अपना
और उसका अतीत
उभरता चला,
उसके चेहरे की
झुर्रियों में

२.
डूबते को तिनके का
सहारा ही काफी है,
जैसे किस्मत के मारो को
भाग्य रेखा का
काश तिनके बचा पाते,
डूबने से



24 comments:

  1. बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति...

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  2. 5.5/10

    उत्कृष्ट सुन्दर रचना

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  3. अरे बहुत खूब...सच है ये तो...
    मेरे ब्लॉग पर इस बार ....

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  4. बहुत ही अच्छी कविता !
    कम शब्दों मे सुन्दर भवाभिव्यक्ति !

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  5. बेहद सुन्दर भाव समन्वय्।

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  6. very touching expressions..

    regards

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  7. अच्छा लगा बिल्कूल सीधी और सही बात कही

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  8. सुंदर प्रस्तुति....
    आपको
    दशहरा पर शुभकामनाएँ ..

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  9. डूबते को तिनके का
    सहारा ही काफी है,
    जैसे किस्मत के मारो को
    भाग्य रेखा का ।
    काश तिनके बचा पाते,
    डूबने से ।
    यथार्थ को पेश किया है आपने!..शुभ नवरात्री!

    Read more: जज़्बात, ज़िन्दगी और मै http://indranil-sail.blogspot.com/#ixzz12Wul8kcL
    Under Creative Commons License: Attribution

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  10. डूबते को तिनके का
    सहारा ही काफी है,
    जैसे किस्मत के मारो को
    भाग्य रेखा का ।
    काश तिनके बचा पाते,
    डूबने से
    बहुत सुन्दर. चंद शब्दों में आम आदमी की व्यथा कह दी आपने तो.
    विजयादशमी की अनन्त शुभकामनायें.

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  11. जीवन के यथार्थ का
    नपे-तुले शब्दों में
    अतुलनीय चित्रण ...
    वाह !!

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  12. बहुत सुंदर और कमाल की अभिव्यक्ति!

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  13. अच्छा है जीवन को बस चंद शब्दों में जान लेना

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  14. सैल भाई, क्षणिकाएँ गागर में सागर भरने के लिए जानी जाती हैं और आप इस विधा में एकदम परफेक्ट हो।

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  15. अभी-अभी आपका प्रोफाईल देखा, तो पता चला कि आप पेशे से भूवैज्ञानिक हैं। यह जानकर प्रसन्नता हुई। यदि आप साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन http://sb.samwaad.com/ से जुड़ें, तो हमें अतीव प्रसन्नता होगी।
    और हाँ, कृपया आप मेरे मेल आई डी zakirlko@gmail.com पर सम्पर्क करने का कष्ट करें, क्योंकि आप तस्लीम चित्र पहेली के विजेता चुने गये हैं।

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  16. अति-सुन्दर रचना .बड़े चलो !!

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  17. वो हाथ की रेखाएं
    दिखाता फिरा उम्र भर,
    जानने के लिए
    भविष्य अपना ।
    और उसका अतीत
    उभरता चला,
    उसके चेहरे की
    झुर्रियों में ।
    लाजवाब। बधाई इस रचना के लिये।

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  18. दोनों बातें लाजवाब हैं। ऐसा होना भी बेबसी का ही एक रूप है - निर्बल के बल राम!

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  19. काश तिनके बचा पाते डूबने वाले को.....

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  20. लाजवाब हैं दोनों ही रचनाएँ ... बहुत प्रभावी ....

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